मुक़्तदी (यानी जो शख्स इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ रहा हो) के लिए सलाम फेरने का सुन्नत तरीका क्या है?
بِسْمِ اللہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیْمِ
اَلْجَوَابُ بِعَوْنِ الْمَلِکِ الْوَھَّابِ اَللّٰھُمَّ ھِدَایَۃَ الْحَقِّ وَالصَّوَابِ
सुन्नत यह है कि जो मुक़्तदी शुरू से इमाम के साथ नमाज़ में शरीक है, वह इमाम के सलाम फेरते ही अपना पहला सलाम फेर दे। यानी जब इमाम ने सलाम फेरना शुरू किया, तो इमाम का सलाम खत्म होने से पहले मुक़्तदी सलाम फेरना शुरू कर दे। यही तरीका इमाम-ए-आज़म रज़ी अल्लाहु अन्हु के नज़दीक भी सुन्नत है और मुक़्तदी को इसी पर अमल करने का हुक्म है।
बुखारी शरीफ में है
"وَكَانَ ابْنُ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا يَسْتَحِبُّ إِذَا سَلَّمَ الْإِمَامُ أَنْ يُسَلِّمَ مَنْ خَلْفَهُ... عَنْ عِتْبَانَ قَالَ صَلَّيْنَا مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَسَلَّمْنَا حِينَ سَلَّمَ"
हज़रत इब्ने उमर पसंद करते थे कि जब इमाम सलाम फेरे, तो मुक़तदी भी सलाम फेरे... हज़रत इत्बान से मरवी है, कहते हैं कि हमने नबी पाक ﷺ के साथ नमाज़ पढ़ी, जब हुज़ूर ﷺ ने सलाम फेरा, तो हमने भी सलाम फेरा।
(सहीह अल-बुख़ारी मअ अल-उम्दा, जि 4, स 600 मत्वूआ मुल्तान)
फतावा रज़विया में है: "मुताबअत-ए-इमाम, जो मुक़्तदी पर फ़र्ज़ में फ़र्ज़ है, तीन सूरतों को शामिल है। एक यह कि उसका हर फ़े'ल, फ़े'ल-ए-इमाम के साथ कमाल मुक़ारनत पर महज़ बिला फ़स्ल वाक़े होता रहे। यह अ'इन तरीक़ा मस्नूना है और हमारे इमाम-ए-आ'ज़म के नज़दीक मुक़्तदी को इसी का हुक्म।
(फ़तावा रज़विया, जि 7, स 274, रज़ा फ़ाउंडेशन, लाहौर)
والله اعلم عز وجل ورسوله اعلم صلى الله تعالى عليه و آله و سلم